कभी सरलता से, कभी उलझनों में, कभी थक-हार कर फिर से नई ऊर्जा के साथ —
चलती रही है, चल रही है, और चलती रहेगी —
यह संकीर्तन यात्रा, निरंतर, जीवन पर्यंत।
यह सफर है उनसे बिछड़कर, फिर से उन्हीं को पाने का —
यह है अंतर की यात्रा... संकीर्तन यात्रा।
“संकीर्तन यात्रा” केवल एक कार्यक्रम या कथा नहीं, बल्कि पूज्या श्री देवी चित्रलेखा जी के सम्पूर्ण जीवन का नाम है।
बचपन से श्रीमद् भागवत कथा का प्रचार करते हुए देवीजी ने जब देखा कि उनका हर कदम, हर प्रवास, हर संवाद —
भगवान के नाम के प्रचार से जुड़ा है, तब उन्होंने अपने जीवन को ही नाम दिया — “संकीर्तन यात्रा।”
देवीजी कहती हैं —
यह यात्रा केवल मंच की नहीं, हृदयों की यात्रा है —
जो हर भक्त को भीतर के भगवान से जोड़ देती है।
हर संकीर्तन में जब राधे-श्याम का नाम गूंजता है,
तो वातावरण ही नहीं, आत्मा भी उस प्रेम में झूम उठती है।
हर घर में हरिनाम का प्रसार करना,
युवाओं में भक्ति और जीवन मूल्यों की जागृति लाना,
गौसेवा, करुणा और सेवा भावना का प्रचार करना,
और राधे-गोविंद प्रेम की मधुर अनुभूति कराना।
संकीर्तन यात्रा केवल एक आयोजन नहीं —
यह एक आंदोलन है, एक प्रवाह है,
जो हर आत्मा को पुकारता है —
“नाम लो, प्रेम फैलाओ, और अपने भीतर के कृष्ण को पहचानो।”
संकीर्तन भगवान का साक्षात स्वरूप है।
जब हम संकीर्तन करते हैं, तब हम भगवान को अपने सबसे निकट पाते हैं।
भगवान स्वयं कहते हैं —