श्री राधेगोविंद मेरे जीवन के ठाकुर हैं। उनकी कृपा का अनुभव शब्दों में समाना कठिन है, क्योंकि मेरे जीवन का सबसे पावन क्षण वह था जब श्री राधेगोविंद मेरे जीवन में पधारे और मेरे परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गए।
राधेगोविंद के प्रति मेरे मन में जो प्रेम है, उसे शब्दों में बाँध पाना असंभव है, क्योंकि उनकी दिव्य उपस्थिति मेरे घर को प्रतिदिन शांति, आनंद और कृपा से भर देती है।
मेरी प्रथम विवाह वर्षगाँठ निकट थी और मन में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि ऐसा क्या उपहार दूँ जो प्रेम और भक्ति का सर्वोच्च प्रतीक हो। उत्तर भीतर से आया — ठाकुर जी।
बहुत पहले से मन में भाव था कि श्याम सुंदर पूरे जेड ब्लैक रूप में हों और शीजी गोरी, गोरांग, पूर्ण माधुर्य के साथ। वृंदावन खूब खोजा, पर कोई मूर्ति मन को आकर्षित न कर सकी।
फिर अचानक जयपुर के एक शिल्पकार से संपर्क हुआ। मैंने केवल भाव भेजा और उन्होंने उस भाव को साकार रूप दे दिया — जैसे मन ने जो चित्र रखा था, ठाकुर जी वैसी ही मूर्ति के रूप में प्रकट हो गए।
अब प्रश्न था कि उन्हें घर कैसे लाया जाए। शिल्पकार बोले —
और सचमुच ठाकुर जी पहली सीट पर बैठे-बैठे आए, होडल में उतारे गए, एक भैया बाइक लेकर गए, और ठाकुर जी को अपने हाथों में उठा कर मेरे घर ले आए।
उसी क्षण मन समझ गया — मैंने ठाकुर जी को नहीं बुलाया था, ठाकुर जी स्वयं आने की इच्छा करके आए थे।
अब लगभग सात वर्षों से उनकी सेवा कर रही हूँ। वे नखरे भी करते हैं, प्यार भी करते हैं, संकेत भी देते हैं। जो धारण उन्हें पसंद आएगा वही स्वीकार करेंगे, और जो मन को न भाए उसे गिरा भी देंगे।
उनकी हर छोटी-बड़ी लीला मुझे यह याद दिलाती है कि भक्ति चमत्कारों से नहीं — भाव से चलती है।
और उन्होंने सच में वैसा ही किया। राधेगोविंद वास्तविक रूप में जितने सुंदर हैं, उतने सुंदर कोई चित्र कभी नहीं दिखा सकता।